जब रूस ने यूक्रेन पर अटैक किया था, तब ज्यादातर लोगों को यही लग रहा था कि यह युद्ध कुछ ही हफ्तों या महीनों में खत्म हो जाएगा। लेकिन सालों बाद भी इस जंग का कोई निर्णायक अंत नहीं दिखाई देता। अर्थव्यवस्थाएं हिली हुई हैं और दुनिया एक लंबे जियोपॉलिटिकल डेडलॉक से गुजर रही है। दूसरी तरफ, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव भी एक एंडलेस वॉर की आहट दे रहा है। इस बीच, इंडिया टीवी ने ट्रंप की आक्रामक रणनीति, ईरान का नया हॉर्मुज वाला हथियार और इजरायल की भूमिका के मुद्दे पर जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव से एक्सक्लूसिव बातचीत की।
सवाल- डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में धमकी दी कि अगर अमेरिका ने नरमी बरतना बंद नहीं किया, तो ईरान का अस्तित्व मिट जाएगा। क्या यह सिर्फ एक 'पॉलिटिकल पोस्चरिंग' है या ट्रंप ने परमाणु बम की धमकी दी है।
जवाब- जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव ने कहा कि यह मुख्य रूप से एक साइकोलॉजिकल वॉरफेयर है। इसका मकसद केवल ईरान को डराना नहीं है, बल्कि आस-पास के अरब देशों को भी यह संदेश देना है कि अगर वे अमेरिका की बात नहीं मानेंगे, तो ट्रंप किसी भी हद तक जा सकते हैं।
रोबिंदर सचदेव बोले 'जहां तक परमाणु हमले की बात है, दुनिया में 'पॉसिबिलिटी' और 'प्रोबेबिलिटी' दो अलग-अलग चीजें हैं। पॉसिबल तो यह भी है कि कल सूरज गायब हो जाए, लेकिन उसकी प्रोबेबिलिटी शून्य है। ठीक इसी तरह, अमेरिका की तरफ से परमाणु हमले की प्रोबेबिलिटी बहुत ही कम है।'
ट्रंप की पर्सनैलिटी को समझने के लिए वॉल स्ट्रीट में एक टर्म इस्तेमाल होता है- TACO, जिसके दो मायने हैं-
Trump Always Chickens Out- यानी गेम ऑफ चिकन में आखिरी मिनट में ट्रंप पीछे हट जाते हैं या यू-टर्न ले लेते हैं।
Trump Always Carries On- यानी वह जो ठान लेते हैं, उसे किसी न किसी तरह जारी रखते हैं, जैसे टैरिफ के मामले में उन्होंने किया।
ट्रंप जानबूझकर खुद को अनिश्चित बनाए रखते हैं ताकि विरोधी उनके खिलाफ कोई एक ठोस रणनीति न बना सकें। यह उनके 1970 और 80 के दशक के न्यूयॉर्क रियल एस्टेट बिजनेस का ब्लफ करने और शो-ऑफ करने का पुराना तरीका है: रोबिंदर सचदेव
सवाल- फरवरी 2022 से रूस-यूक्रेन जंग बिना किसी नतीजे के खिंच रही है। क्या आपको लगता है कि मिडिल ईस्ट का यह नया संकट भी उसी तरह उलझ चुका है? इन दोनों संघर्षों में क्या समानताएं और अंतर हैं?
जवाब- रोबिंदर सचदेव ने कहा कि कोविड-19 के बाद से पिछले 100 सालों का पुराना वर्ल्ड ऑर्डर बिखर रहा है और एक नया 'वर्ल्ड मैट्रिक्स' अंडर-कंस्ट्रक्शन है। आज हर देश अपने नए पार्टनर्स और सप्लाई चेन तलाश रहा है।
जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट बोले, 'समानताओं की बात करें, तो रूस-यूक्रेन युद्ध ने इस धारणा को ध्वस्त कर दिया है कि एक 'सुपर पावर' छोटे देश को चंद दिनों में हरा सकता है। यही स्थिति मिडिल ईस्ट में है। इजरायल ने दावा किया था कि वह गाजा से हमास का नामोनिशान मिटा देगा, लेकिन 400 स्क्वायर किलोमीटर के छोटे से इलाके को इजरायल अपने पूरे हाई-टेक हथियारों, अमेरिकी फंडिंग और इंटेलिजेंस के बावजूद पूरी तरह कंट्रोल नहीं कर पाया।'
अमेरिका-ईरान का युद्ध भी एक एंडलेस कॉन्फ्लिक्ट बनता जा रहा है। भले ही किसी कारणवश शांति समझौता हो जाए, लेकिन यह आग सुलगती रहेगी और बीच-बीच में भड़कती रहेगी: रोबिंदर सचदेव
सवाल- जब तक युद्ध में एक पक्ष पूरी तरह टूट न जाए, आमतौर पर शांति वार्ता सफल नहीं होती। वर्तमान में अमेरिका एकतरफा शर्तें थोप रहा है। ऐसे में ईरान और अमेरिका का शांति समझौता कैसे मुमकिन है?
जवाब- जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव ने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि समझौता तभी हो जब एक पक्ष पूरी तरह ढह जाए। कई बार दोनों पक्ष अपने हालात को देखकर एक Dynamic Equilibrium पर आ जाते हैं। वर्तमान स्थिति में ईरान का पलड़ा भारी है और वह आक्रामक रुख अपनाए हुए है। अमेरिका इस युद्ध से थक चुका है और ट्रंप को अपनी अर्थव्यवस्था और आगामी चुनावों की चिंता है।
रोबिंदर सचदेव के मुताबिक, इस जंग में ईरान के पास एक नया सुपर वेपन हाथ लगा है, जिसे मैं हॉर्मुजी पंजा कहता हूं। जब हॉर्मुज स्ट्रेट को ईरान ने ब्लॉक किया, तो दुनिया भर में हड़कंप मच गया। ईरान ने इसे अपनी शर्तों में सबसे ऊपर रखा है। उनकी प्रमुख मांग है कि लेबनान और हिजबुल्लाह पर इजरायल के हमले रुकने चाहिए। इसलिए, कोई भी सीजफायर स्पष्ट शर्तों वाला नहीं होगा, बल्कि उसमें एक धुंध बनी रहेगी। यह 'सीजफायर' नहीं, बल्कि 'पीस-फायर' होगा, जहां शांति की बातों के बीच छिटपुट हमले जारी रहेंगे।
सवाल- ट्रंप की 'मैडमैन थ्योरी' के पीछे असल रणनीति क्या है? क्या अपनी नाक बचाने के लिए अमेरिका या इजरायल सच में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर सकते हैं?
जवाब- रोबिंदर सचदेव के मुताबिक, मैडमैन थ्योरी का इस्तेमाल पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने भी चीन के खिलाफ किया था। इसका मूल सिद्धांत है- दुश्मन को यह सोचने पर मजबूर कर दो कि आप पागल हो चुके हैं और किसी भी पल कोई भी खतरनाक कदम उठा सकते हैं। इससे दुश्मन कंफ्यूज रहता है। ट्रंप इसी रणनीति का पालन कर रहे हैं।
जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव के अनुसार, परमाणु हमले की बात बहुत ही दुखद है, लेकिन इजरायल के भीतर एक एक्सट्रीम धड़ा यह मानता है कि जिस तरह द्वितीय विश्व युद्ध को खत्म करने के लिए जापान पर परमाणु बम गिराया गया था, उसी तरह ईरान की कमर हमेशा के लिए तोड़ने के लिए तेहरान पर परमाणु हमला जरूरी है। हालांकि, यह मुख्यधारा का विचार नहीं है और इसकी प्रोबेबिलिटी बहुत कम है, लेकिन जियोपॉलिटिक्स में मान्यताएं टूटते देर नहीं लगती, इसलिए इसे पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।
सवाल- अगर यह तनाव बढ़ता है और स्टेट ऑफ हॉर्मुज में तेल की सप्लाई फिर से बाधित होती है, तो इसका सबसे ज्यादा खामियाजा किन देशों को भुगतना पड़ेगा?
जवाब- रोबिंदर सचदेव ने कहा, 'हॉर्मुज स्ट्रेट का बंद होना केवल सैन्य समस्या नहीं है, बल्कि यह शिप्स के इंश्योरेंस की सबसे बड़ी समस्या है। अगर हल्का सा भी खतरा हुआ, तो इंश्योरेंस कंपनियां तेल टैंकरों का बीमा नहीं करेंगी और कोई भी देश 100 मिलियन डॉलर का शिप खतरे में नहीं डालेगा।'
अगर जंग दोबारा भड़की, तो इसका भयानक असर होगा-
गल्फ देश- सबसे बड़ा नुकसान दुबई, कतर और बहरीन जैसे देशों को होगा, जो अपनी इकोनॉमी को फाइनेंस, टूरिज्म और स्पोर्ट्स इवेंट्स पर चला रहे हैं। युद्ध के कारण बड़े इन्वेस्टर्स वहां से अपना पैसा निकाल लेंगे।
क्रूड ऑयल और पेट्रोकेमिकल्स- क्रूड ऑयल केवल पेट्रोल-डीजल नहीं है। नाफ्था और पेट्रोकेमिकल्स का इस्तेमाल टायर, पेंट, टूथपेस्ट, कपड़े, दवाइयों, लैपटॉप और मोबाइल के प्लास्टिक पार्ट्स में होता है।
ग्लोबल रिजर्व- पिछले चार महीनों के संकट में दुनिया ने अपने ऑयल रिजर्व का इस्तेमाल करके काम चलाया है। अब वे रिजर्व बॉटम लेवल पर आ चुके हैं। अब अगर नाकेबंदी होती है, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं, मैन्युफैक्चरिंग और फूड सप्लाई चेन चरमरा जाएगी।
सवाल- इस पूरे समीकरण में आप रूस और चीन की भूमिका को आप कैसे देखते हैं? क्या ईरान-अमेरिका की जंग जारी रहने से दोनों को कुछ फायदा है। और ये कितना बड़ा है।
जवाब- जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव के मुताबिक, इस जंग का सबसे बड़ा फायदा चीन और रूस को ही मिल रहा है।
चीन के फायदे- अमेरिका जितने ज्यादा हथियार जैसे- पैट्रियट मिसाइल इजरायल और यूक्रेन को दे रहा है, उसकी अपनी इन्वेंटरी खाली हो रही है। अमेरिका का ध्यान बंटने से चीन को अपने क्षेत्र में डोमिनेंस बढ़ाने का मौका मिल रहा है। इसके अलावा, ऊर्जा संकट के कारण चीन के सोलर पैनल्स, बैटरीज और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) के एक्सपोर्ट में भारी उछाल आया है। चीन खुद रोजाना 11 मिलियन बैरल तेल आयात करता था, जिसे उसने EV के जरिए 1 मिलियन बैरल तक कम कर लिया है।
रूस के फायदे- अमेरिका का पूरा फोकस अब ईरान पर है, जिससे यूक्रेन को मिलने वाली अमेरिकी सैन्य मदद लगभग रुक गई है। साथ ही, तेल की कीमतें बढ़ने और प्रतिबंधों में ढील के कारण रूस अपना तेल आसानी से बेचकर मुनाफा कमा रहा है।
सवाल- शांति वार्ता में इजरायल को साइडलाइन किया जा रहा है, लेकिन वह लेबनान में लगातार आक्रामक है। अगर अमेरिका इस युद्ध से निकलना चाहे, तो क्या इजरायल ऐसा करने देगा?
जवाब- रोबिंदर सचदेव ने कहा, 'इजरायल को अंततः अमेरिका की बात माननी ही पड़ेगी क्योंकि वह अमेरिकी सैन्य और आर्थिक मदद के बिना सर्वाइव नहीं कर सकता। इजरायल के 24 बिलियन डॉलर के डिफेंस बजट में 4 बिलियन डॉलर अमेरिका देता है। जेडी वेंस ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि इजरायल की तरफ से इस्तेमाल किए गए दो-तिहाई बम अमेरिका ने मुफ्त दिए हैं, इसलिए उन्हें वाशिंगटन की बात सुननी होगी।'
रोबिंदर सचदेव के मुताबिक, बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह उनके राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई है। देश के अंदर उन पर भ्रष्टाचार और 7 अक्टूबर के हमले में इंटेलिजेंस फेलियर के आरोप हैं। अक्टूबर में वहां चुनाव हैं, इसलिए नेतन्याहू के व्यक्तिगत हित में यही है कि युद्ध खिंचता रहे ताकि वे अपनी सत्ता बचा सकें।
सवाल- भारत ने अभी तक यही रुख अपनाया है कि बातचीत के जरिए शांति होनी चाहिए। हमारी जो नॉन अलाइमेंट से लेकर ऑल अलाइमेंट की रणनीति है वह कैसे इस सिचुएशन में अच्छी है।
जवाब- रोबिंदर सचदेव ने बताया कि भारत की विदेश नीति वर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से बिल्कुल संतुलित और बेस्ट है। हमें यह समझना होगा कि रूस-यूक्रेन या अमेरिका-ईरान के इन दशकों पुराने विवादों को सुलझाने के लिए हमारे पास कोई सीधा 'टूल' नहीं है। ये झगड़े गहरे सांस्कृतिक और राष्ट्रीय हितों से जुड़े हैं, जो केवल 'दोस्ती' या 'चाय पीने' से नहीं सुलझ सकते। इसलिए भारत का शांति और कूटनीति का रुख एकदम सही है।
जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव बोले, 'बदलते वर्ल्ड ऑर्डर में हम एक तरफ ग्लोबल साउथ के देशों के साथ रिश्ते मजबूत कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका- जो हमारा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है और जहां से इन्वेस्टमेंट आना है, और रूस के साथ संतुलन बना रहे हैं।'
रोबिंदर सचदेव ने कहा कि हालांकि, हमारी फॉरेन पॉलिसी को और धारदार बनाने के लिए एक बड़ा संस्थागत सुधार चाहिए। वर्तमान में हमारे विदेश मंत्रालय में केवल करीब 1 हजार IFS अधिकारी हैं। जबकि अमेरिका के पास लगभग 10 हजार अधिकारी हैं, जो लगातार डेटा, रिसर्च और एनालिसिस कर रहे हैं। ग्लोबल पावर बनने के लिए हमें अपने डिप्लोमैटिक स्टाफ की संख्या बढ़ाकर कम से कम 2,000 करनी होगी और डीप-एक्सपर्ट्स की भर्ती करनी होगी।